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मैं भी तनहा हूँ और तुम भी तन्हा,
वक़्त कुछ साथ गुजारा जाए।
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शाम खाली है जाम खाली है,
ज़िन्दगी यूँ गुज़रने वाली है।
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आँखें फूटें जो झपकती भी हों,
शब-ए-तन्हाई में कैसा सोना।
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जब से देखा है चाँद को तन्हा,
तुम से भी कोई शिकायत ना रही।
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यूँ तो हर रंग का मौसम मुझसे वाकिफ है मगर
रात की तन्हाई मुझे कुछ अलग ही जानती है।
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मुझको मेरी तन्हाई से अब शिकायत नहीं है,
मैं पत्थर हूँ मुझे खुद से भी मोहब्बत नहीं है।
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कुछ कर गुजरने की चाह में कहाँ-कहाँ से गुजरे,
अकेले ही नजर आये हम जहाँ-जहाँ से गुजरे।
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वो हर बार मुझे छोड़ के चले जाते हैं तन्हा,
मैं मज़बूत बहुत हूँ लेकिन कोई पत्थर तो नहीं हूँ।
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मीठी सी खुशबू में रहते हैं गुमसुम,
अपने अहसास से बाँट लो तन्हाई मेरी।
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तन्हाईयाँ कुछ इस तरह से डसने लगी मुझे,
मैं आज अपने पैरों की आहट से डर गया।
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चन्द रातों के महकते ख़्वाब,
ज़िन्दगी भर की नींद ले गए।
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तुम क्या गए कि वक़्त का अहसास मर गया,
रातों को जागते रहे और दिन को सो गए।
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कमाल का ताना देती है ये दुनिया मुझे,
अगर वो तेरा है तो तेरे पास क्यों नहीं।
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एक उम्र है जो तेरे बगैर गुजारनी है,
और एक लम्हा भी तेरे बगैर गुजरता नहीं।
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सहारा लेना ही पड़ता है मुझको दरिया का,
मैं एक कतरा हूँ तनहा तो बह नहीं सकता।
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ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तों,
जिसको कोई मिल गया वो और तन्हा हो गया।
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तुम जब आओगे तो खोया हुआ पाओगे मुझे,
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं,
मेरे कमरे को सजाने कि तमन्ना है तुम्हें,
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं।
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जगमगाते शहर की रानाइयों में क्या न था,
ढूँढ़ने निकला था जिसको बस वही चेहरा न था,
हम वही, तुम भी वही, मौसम वही, मंज़र वही,
फ़ासले बढ़ जायेंगे इतने मैंने कभी सोचा न था।
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मैं हूँ दिल है तन्हाई है,
तुम भी जो होते तो अच्छा होता।
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कभी जब गौर से देखोगे तो इतना जान जाओगे,
कि तुम्हारे बिन हर लम्हा हमारी जान लेता है।
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दिल गया तो कोई आँखें भी ले जाता,
फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ।
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एक तेरे ना होने से बदल जाता है सब कुछ
कल धूप भी दीवार पे पूरी नहीं उतरी।
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कितनी अजीब है इस शहर की तन्हाई भी,
हजारों लोग हैं मगर कोई उस जैसा नहीं है।
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उनसे मुलाक़ात के सिलसिले क्या बन्द हुए,
मुद्दतें बीती हैं आईने से रूबरू हुए।
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कोई रफ़ीक़ न रहबर न कोई रहगुज़र,
उड़ा के लाई है किस शहर में हवा मुझको।
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शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आप की कमी सी है।
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दिल को आता है जब भी ख्याल उनका,
तस्वीर से पूछते हैं फिर हाल उनका।
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तन्हाई रही साथ ता-जिंदगी मेरे,
शिकवा नहीं कि कोई साथ न रहा।
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क्या करेंगे महफिलों में हम बता,
मेरा दिल रहता है काफिलों में अकेला।
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तेरे सहारे मौत से लड़ता रहा ता-ज़िंदगी,
क्या करूँ इस ज़िंदगी का मैं बता तेरे बिना।
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तुम से बिछड़ के कुछ यूँ वक़्त गुज़ारा,
कभी ज़िंदगी को तरसे कभी मौत को पुकारा।
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ख्वाब बोये थे और अकेलापन काटा है,
इस मोहब्बत में यारों बहुत घाटा है।
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उसे पाना उसे खोना उसी के हिज्र में रोना,
यही गर इश्क है तो हम तन्हा ही अच्छे हैं।
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कैद में इतना ज़माना हो गया,
अब कफस भी आशियाना हो गया।
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एक लहजा नहीं करार जी को,
मौत आये बस ऐसी जिंदगी को।
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रास्ता मुझको दिखाया और ओझल हो गए,
आप के रहमो-करम का शुक्रिया कैसे करूँ।
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चंद लम्हों के लिए एक मुलाक़ात रही,
फिर ना वो तू, ना वो मैं, ना वो रात रही।
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देख कर चेहरा पलट देते हैं अब वो आइना,
मौसम-ए-फुरकत उन्हें सूरत कोई भाती नहीं।
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कभी सोचा न था तन्हाइयों का दर्द यूँ होगा,
मेरे दुश्मन ही मेरा हाल मुझसे पूछते हैं।
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सुबकती रही रात अकेली तनहाइयों के आगोश़ में,
और वो काफ़िर दिन से मोहब्बत कर के उसका हो गया।
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तुम फिर ना आ सकोगे, बताना तो था ना मुझे,
तुम दूर जा कर बस गए मैं ढूंढ़ता ही रह गया।
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तेरे बगैर इस मौसम में वो मजा कहाँ,
काँटों की तरह चुभती है बारिश की बूँदें।
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कितना भी दुनिया के लिए हँस के जी लें हम,
रुला देती है फिर भी किसी की कमी कभी-कभी।
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कुदरत के इन हसीन नजारों का हम क्या करें,
तुम साथ नहीं तो इन चाँद सितारों का क्या करें।
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काश तू समझ सकती मोहब्बत के उसूलों को,
किसी की साँसों में समाकर उसे तन्हा नहीं करते।
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बंद मुट्ठी से याद गिरती है रेत की मानिंद,
वो चला गया ज़िन्दगी से ज़र्रा-ज़र्रा कर के।
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कभी घबरा गया होगा दिल तन्हाई में उनका,
मेरी तस्वीर को सीने से लगा कर सो गए होंगे।
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चला जाऊंगा जैसे खुद को तनहा छोड़ कर,
मैं अपने आपको रातों में उठकर देख लेता हूँ।
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एहतियातन देखता चल अपने साए की तरफ,
इस तरह शायद तुझे एहसास-ए-तन्हाई न हो।
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कहने लगी है अब तो मेरी तन्हाई भी मुझसे,
मुझसे कर लो मोहब्बत मैं तो बेवफा भी नहीं।
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कैसे गुजरती है मेरी
हर एक शाम तुम्हारे बगैर,
अगर तुम देख लेते तो
कभी तन्हा न छोड़ते मुझे।
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बिछड़ के भी वो रोज
मिलता है मुझे ख्वाबों में,
अगर ये नींद न होती तो
कब के मर गए होते।
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अभी ज़िंदा हूँ, लेकिन
सोचता रहता हूँ अकेले में,
कि अब तक किस तमन्ना के
सहारे जी लिया मैंने।
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बहुत सोचा बहुत समझा
बहुत ही देर तक परखा,
कि तन्हा हो के जी लेना
मोहब्बत से तो बेहतर है।
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